ईमानदार राजनीति़ का दौर आरंभ: जनता के संवेदनशील सेवक कार्यकर्ता हीं अब सत्ता की कुर्सी पर बैठेंगे।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को ही सर्वशक्तिमान माना गया है। सत्ता की कुर्सी पर बैठने के लिए योग्य समाज सेवी एवं संवेदनशील व्यक्ति को चुनकर प्रस्तावक उनका नामांकन कराते हैं और उसके सेवा कार्यों को देखते हुए जनता उन्हें मत देती है। चुनाव प्रणाली का यही सच है।आजादी के बाद बहुत हद तक इस नीति सिद्धांत का अनुपालन किया गया और जिन लोगों ने देश को आजादी दिलाने में अपना योगदान दिया था उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सत्ता में भेजा गया और लंबे समय से गुलाम रहे भारत को नए सिरे से सजाने संवारने एवं विकसित करने के लिए उनकी सेवा ली गई। धीरे -धीरे सेवाधारियों की अहेलना होने लगी और धनबल का प्रयोग होने लगा और सत्ता पर ऐसे लोग ही आने लगे।जात-पात, धर्म, अगड़ा-पिछड़ा में समाज बंटता गया और चुनाव के समय खुल कर के इसका नंगा नाच होने लगा। राजनीति के अपराधीकरण का मूल कारण यही हुआ। उपेक्षितों, दलितो और गरीबों के लिए देश में वामदलों ने भी लंबे समय तक आंदोलन चलाया लेकिन बाद में वे भी भटकाव के शिकार हुए और विखर गए।

देश में दूसरी आजादी के लिए जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में राष्ट्र व्यापी छात्र आंदोलन चला जिसका मुख्य मुद्दा व्यवस्था परिवर्तन था। महंगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार इन तीन बिंदुओं पर हुए आंदोलन का अंत भी बहुत संतोषजनक नहीं रहा और व्यवस्था परिवर्तन के मामले में जरा भी सफलता नहीं मिली, बल्कि भ्रष्टाचार और बढ़ ही गया। सिर्फ कांग्रेस की सत्ता गई और जनता पार्टी की सरकार केंद्र में बनी बस इतना ही होकर रह गया। जेपी आंदोलन में छात्रों से एक फॉर्म भराया गया था जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि छात्र सत्ता पर अंकुश रखेंगे, सत्ता में नहीं आएंगे लेकिन उसके  बाद जब चुनाव की घोषणा हुई तो सारे आंदोलनकारी छात्र हीं पहले आगे आये। टिकट देने के समय भी सेवा, संवेदनशीलता इन सब बातों को जनता पार्टी वाले भी नजर अंदाज कर दिए और कांग्रेस परम्परा को ही कायम रखा। जो ज्यादा खुशामदी और चाटुकार थे, धनबल वाले थे ऐसे लोगों को जनता पार्टी वाले लोगों ने टिकट दिया।

आजादी के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक आधारित पार्टी जनसंघ ने सेवा को हीं प्राथमिकता दिया और अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने में कोई भी गलत रास्ता को नहीं अपनाया।भाजपा, एनडीए भी पांच बरस पूर्व जब पूर्ण बहुमत से केंद्र में आई तो उस समय इस पार्टी ने भी कमोबेश जात पात धनबल वालों को ही प्राथमिकता दिया। उस समय एनडीए के सामने कुछ मजबूरी थी। लोजपा और रालोसपा उनके साथ थी। इस बार रालोसपा नहीं है।इस बार मोदी के नाम पर प्रचंड बहुमत की सरकार बनेगी। नई मोदी सरकार चुनाव प्रणाली और प्रत्यासी के चयन प्रकिया मे निश्चित बदलाव लायेगी ऐसा सभी अनुमान लगाये  बैठे हैं, राजनीतिक दलों द्वारा जब तक टिकट बंटवारे के समय सेवा कार्यों का वायोडाटा प्रमाण के साथ नहीं मांगा जायेगा और टिकट देने का उसे आधार नहीं बनाया जायेगा तब तक बेहतर परिणाम असंभव होगा। प्रत्याशियों के स्वरुप में आध्यात्मिकता झलकनी भी चाहिए।

बिहार में एक से बढकर एक समाज सेवीे हुए जिसके अंदर समाज के प्रति समर्पण रहा है। मेहसी के अमर, मोतीपुर के शिव कुमार कुशवाहा, पश्चिम चंपारण के दिलीप वर्मा ,रामनगर के एक बड़े समाज सेवी बद्री पाण्डेय और थारू बाहुल क्षेत्र के कई थारू समाज सेवीे निकले। अमर ने मुशहर जागरूकता अभियान चलाया, दिलीप वर्मा ने विकलांगों की सेवा की ,बद्री पांडये ने डाकुओं से लोहा लिया कई थारू समाज सेवी थारुओं ने उनके उत्थान के लिए जीवन लगा दिए। तमाम वर्णित नामों में एक मात्र दिल्ली वर्मा जो स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र हैं, उन्होंने चंपारण विकास पार्टी बनाकर विधायक की कुर्सी तक हासिल की। दिलीप वर्मा ने नब्बे के दशक में बिहार में हुए पशुपालन घोटाले को उजागर किया और सुशील मोदी को उन्होंने पूरी जानकारी देकर के घोटालेबाजों को कटघरे में खड़ा करने में कामयाबी हासिल की रविशंकर वर्मा ने जमकर वकालत की।दिलीप वर्मा जब विधायक थे तो विधायक आवास पटना को उन्होंने एक अस्पताल का रूप दिया था और राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित भी हुए थे। सिकटा उनका विधानसभा क्षेत्र था और वहीं से कई टर्म विधायक भी हुए। अपने क्षेत्र के मरीजों का इलाज पटना में अपने पैसे से कराते थे वे खुद अपने विधायक फ्लैट में नहीं रहकर निजी आवास पर रहते थे। प्रति वर्ष अपने जन्मदिन को विकलांग सहायता दिवस के रूप में मनाते हैं। विकलांग, थारू, धांगड़, मुसहर और दलित गरीबों के बीच एक साथ पंक्ति में बैठ कर के भोजन करते रहे हैं। कई बार भाजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचने वाले दिलीप वर्मा पिछले विधानसभा चुनाव में जाति और धार्मिक संकीर्णता के दायरे में वोटरों के बंट जाने से चुनाव हार गये। यद्यपि उन्होंने कभी भी किसी जाति या धर्म को सेवा के संकीर्णता में खुद को नहीं रखा।

हर धर्म जाति के गरीबों की सेवा और मदद उन्होंने की। उनका एक ही नारा रहा कि दुनिया में सिर्फ दो जात- अमीर और गरीब। अमीर के चाहीं गरीब के मदद करेंके। बीते लोकसभा चुनाव में देश के प्रथम लोकसभा सीट बाल्मिकी नगर से जदयू एनडीए के प्रत्याशी वैधनाथ महतो के चुनाव प्रचार में दिलीप वर्मा दिन रात लगे रहे और पूरे लोकसभा क्षेत्र में भ्रमण कर उन्होंने काफी मत दिलवाया और बैधनाथ महतो तीन लाख से अधिक मत से विजई हुए। राज्यसभा में समाज सेवी,आर्ट एंड कल्चर या अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों से चयन किया जाता है। दिलीप वर्मा जो भाजपा से लंबे समय से जुड़े हुए हैं उनके सामाजिक कार्यों को देखते हुए उन्हें राज्यसभा में भेजने की माँग विहार से उठी है, ताकि पूरे देश में विकलांगों के लिए उनकी सेवा अनुभव का लाभ मिल सके। पटना साहिब से लोकसभा के उम्मीदवार रवि शंकर प्रसाद, जो राज्यसभा के सदस्य थे, के विजई होने के बाद राजसभा का एक सीट रिक्त हुआ है और उस सीट पर समाज सेवी दिलीप वर्मा को भेजने की मांग बिहार मे लगातार उठ रही है ।

मोतिहारी, विहार, अशोक कुमार वर्मा ।

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