Politics Update: नरसिंहपुर जिले की 4 विधानसभा सीटों में से 3 पर त्रिकोणीय मुकाबला

नरसिंहपुर। नरसिंहपुर जिले की 4 विधानसभा सीटों में से 3 पर त्रिकोणीय मुकाबला और शेष पर आमने-सामने की टक्कर होने के आसार हैं। फिलहाल यंहा की चारों सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा है। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में नरसिंहपुर जिले में भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो गया था, लेकिन 2009 में तेंदूखेड़ा के उपचुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली थी। इस जिले में कभी कांग्रेस का वर्चस्व रहा लेकिन 90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के बाद हवा बदली और चारों सीटों पर भाजपा ने विजय प्राप्त की थी।यदि हम इस जि़ले के डेढ़ दशक के चुनावी इतिहास पर नजऱ डालें तो चारों सीटों पर मतदाता हर पाँच वर्ष बाद बदलाव लाते रहे हैं. वर्ष 2003 में भाजपा, 2008 में कांग्रेस और 2013 में फिर भाजपा प्रत्याशी चारों सीटों पर निर्वाचित हुए। इस जि़ले में दशकों तक मुश्रान परिवार का वर्चस्व रहा है। कर्नल अजय नारायण मुश्रान विभिन्न कांग्रेस सरकारों में लगभग दो दशक तक मंत्री रहे। उससे पूर्व, उनके पिता श्याम सुन्दर नारायण मुश्रान भी वर्षों मंत्री रहे थे। अब मुश्रान परिवार की राजनीतिक विरासत कर्नल मुश्रान के दामाद और राज्य सभा सदस्य विवेक तन्खा संभाल रहे हैं।

नरसिंहपुर :
जिले की सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली विधानसभा सीट नरसिंहपुर में त्रिकोणीय मुकाबला होने के आसार हैं। नरसिंहपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के जालमसिंह पटेल निर्वाचित हुए थे, जो कुछ महीने पूर्व ही राज्यमंत्री बनाये गये हैं। उन्होंने कांग्रेस के पूर्व विधायक सुनील जायसवाल को 47 हज़ार मतों से ज्यादा के अंतर से हराया था.जालम सिंह की यह जीत 2013 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की तीसरी बड़ी जीत रही थी। तय है कि कद्दावर सांसद प्रहलाद पटेल के छोटे भाई जालम सिंह ही इस बार भी भाजपा के उम्मीदवार होंगे। 2008 के चुनाव में कांग्रेस के सुनील जायसवाल ने भाजपा के अश्वनी धरोलिया को 8199 वोटों से हराया था। वहीँ 2003 के चुनाव में भाजपा के जलम सिंह पटेल ने कांग्रेस के अजय मुश्रान को 16043 वोटों से हराकर सनसनी फैला दी थी। यहां की राजनीति ने प्रदेश को कई सियासी दिग्गज दिए हैं, लेकिन इसके सियासी समीकरण की बात करें तो नरसिंहपुर का इतिहसा काफी दिलचस्प रहा है। कांग्रेस के कर्नल अजय नारायण मुशरान के बाद किसी भी एक पार्टी के उम्मीदवार लगातार यहां जीत दर्ज हासिल करने में असफल रहे हैं। नरसिंहपुर की जनता हर बार अलग अलग पार्टी को मौका देती रही है। 1998 से लेकर अब तक हर विधानसभा चुनाव में यहां विधायक बदलते रहे हैं।
1993 में नरसिंहपुर में बीजेपी के उत्तमचन्द लुनावत यहां चुनाव जीते, तो 1998 में कांग्रेस के कर्नल अजय नारायण मुशरान ने बीजेपी के उत्तम चंद लुनावत को हराकर सीट पर कब्जा किया ।

गाडरवाड़ा :
गाडरवाड़ा विधानसभा सीट में 2013 के चुनाव में दिलचस्प तस्वीर उभरी थी. भाजपा के गोविंद पटेल 25313 मतों से विजयी जरूर रहे, लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी सुनीता पटेल ने उन्हें कड़ी मेहनत के लिए मजबूर कर दिया था. यहां कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही थी। यहां की जनता लोक लुहावने वादों के आधार पर नहीं व्यक्ति विशेष को ज्यादा महत्व देती है। यही वजह है की दोनों ही पार्टियां यहां ऐसे उम्मीदवार पर दांव खेलती है जो जनता की नजरों की कसौटी में खरा उतरे । २००८ के चुनाव में कांग्रेस की साधना स्थापक ने भाजपा के गोविन्द सिंह पटेल को 6000 से अधिक मतों से पराजित किया था जबकि २००३ के चुनाव गोविन्द सिंह पटेल ने साधना स्थापक को 25606 वोटों से हराया था।

गोटेगांव :
गोटेगांव विधानसभा क्षेत्र में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस में आमने-सामने का मुकाबला है। गोटेगांव विधानसभा सीट अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित है। पिछले चुनाव में इस सीट से भाजपा के डॉ. कैलाश जाटव ने 20 हज़ार से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की थी. डॉ. जाटव ने नर्मदा प्रसाद प्रजापति को हराया था. परफॉरमेंस के आधार पर डॉ. जाटव की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। इसी लिए, वह टिकट को लेकर आश्वस्त भी हैं। २००८ में भाजपा के शेखर चौधरी को कांग्रेस के एनपी प्रजापति ने 22320 मतों से शिकस्त दी थी। वहीँ 2003 के चुनाव में भाजपा के हाकमसिंह चढ़ार ने एनपी प्रजापति को 1323 वोटों से परास्त किया था। यहाँ हर चुनाव में विधायक बदल जाता है इस बार यहाँ कांग्रेस के लिए अपनी खोयी जमीन वापस पाने की चुनौती होगी।

तेंदूखेड़ा :
इसी तरह तेंदूखेड़ा विधानसभा सीट पर भी दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच कड़े मुकाबले की सम्भावना है। 2013 में इस सीट से कांग्रेस के सुरेन्द्र कुमार और भाजपा के संजय शर्मा चुनाव मैदान में थे । भाजपा के संजय शर्मा 44 हज़ार से ज्यादा वोटों से कांग्रेस के सुरेन्द्र घिमोले को पराजित कर विधायक निर्वाचित हुए. शर्मा की यह जीत जिले की दूसरी सबसे बड़ी जीत होने के कारण यहां भी तय है कि भाजपा उन्हें ही मैदान में उतारेगी. 2008 के चुनाव में जहां कांग्रेस ने अपनी जीत का पचरम लहराया था वहीं भाजपा ने 2009 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस को पटकनी देकर यह सीट छीन ली थी। इस सीट पर दोनों दलों के बागियों द्वारा नाम वापस लेने एवं एक बागी का नामांकन निरस्त होने के कारण मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होगा।

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