महात्मा गांधी की गर्दन उड़ाई गई।

मोतिहारी | पूरे देश में गांधी बनाम गोडसे का मामला गर्म है।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नीचा गिराने और नीचा दिखाने के लिए देश में एक षडयंत्र चल रहा है और गोडसे समर्थक मीडिया एवं प्रचार तंत्र गोडसे की महिमा करने में लगे हुए हैं। यह कितनी शर्म की बात है कि राष्ट्रपिता जिन्होंने अपनी कुर्बानी देश के लिए दे दी और आज उन्हे पुरा विश्व मान रहा है,आज उसे देश में चंद लोगों द्वारा नकारने की एक मुहिम चलाई जा रही है।

गांधी की दुहाई देने वाली केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार इस घृणित अभियान  को सिर्फ मूक दर्शक बनकर देखती आ रही है। सरकार की चुप्पी का ही परिणाम है कि यह रोग पूरे देश में फैल रहा है और प्रशासन भी इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है। गांधी विरोध का एक नमूना गांधी की कर्मभूमि चंपारण के भेलवा कोठी परिसर में हाल ही में घटी है। दो हजार सत्रह -अठारह में पूरे देश में चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह का भव्य आयोजन किया गया। शताब्दी समारोह में अरबों रुपये खर्च हुए। 2017 में दस अप्रैल को बिहार के तत्कालीन महामहिम राज्यपाल श्री रामनाथ कोविंद, जो अभी देश के राष्ट्रपति हैं, ने शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया था। शताब्दी समारोह पर चंपारण में लगातार एक वर्ष तक कार्यक्रम चलते रहे और उस कार्यक्रम का समापन दो हजार अठारह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोतिहारी के गांधी मैदान में किया था। शताब्दी समारोह के कार्यक्रम में चंपारण के कोने कोने में जहां -जहां गांधी जी गए थे वहां-वहां भी कार्यक्रम किए गए।

यह बात सही है कि गांधी को आजादी में अहम रोल निभाने के कारण कांग्रेस पार्टी ने उन्हें ही मुख्य रूप से अपना माना, लेकिन कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद भी चंपारण के लिए बहुत कुछ नहीं किया। उस गैप को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जिले के सांसद तथा तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिह ने पुरा किया। शताब्दी समारोह के दौरान ही जिले के एतिहासिक भेलवा कोठी परिसर में महात्मा गांधी और कसतूरबा की मूर्ति स्थापित की गई। शताब्दी समारोह बीतते बीतते और चुनाव समापन के बाद गोडसे  समर्थक किसी सिरफिरे ने गांधी की मूर्ति गर्दन के ऊपर से उड़ा दी। मूर्ति का गर्दन उडे हुए कई दिन बीत जाने के बाद भी जिले के किसी भी गांधीवादी के अंदर किसी प्रकार का सेंसेशन या आक्रोश नहीं देखा गया। एक भी गांधीवादी ने विरोध नही किया, न प्रतिकार के रूप में भूख हड़ताल की।

ऐसा लगा कि सभी मृत प्रायः हो गए हैं। मूर्ति बनवाने की बात तो दूर रही गांधी संग्रहालय समिति या गांधी की पूजा करने वाली समिति ने भी इस घृणित गोडसे सरीखे  कार्य का विरोध नहीं किया। गांधीवादी एवं प्रजापति पुस्तकालय के संस्थापक श्री नारायण मुनी, संजय सत्यार्थी अधिवक्ता रामजय प्रताप सिंह ने गोडसे सरीखे इस घृणित कार्य का जमकर विरोध किया और जिला प्रशासन से मांग की कि अविलंब वहां गांधी की नई मूर्ति स्थापित की जाए तथा घेराबंदी करके उसे सुरक्षित किया जाए।

अशोक वर्मा।

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