शत्रुघ्न सिन्हा ने एक बार फिर कायस्थों को एकजुट किया

पटना। पटना साहब से चुनाव लड़ रहे हैं भाजपा के निवर्तमान सांसद जो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं ,कायस्थों को नहीं भूले हैं।वैसे फिल्म स्टार होने के नाते जातीय संकीर्णता से शत्रुघ्न सिन्हा बाहर रहे हैं ,लेकिन चुनावी समर में सभी जातियों का समर्थन लेना एक तरह से अनिवार्य होता है, और जिस कुल और जाति में जो जन्म लेता है उस कुल और जाति पर उसका सबसे ज्यादा अधिकार होता है। अमूमन यह देखा जाता है कि जातीय समर्थन के मामले में सभी आगे तो रहते हैं लेकिन दिखावे के रूप में अपने को छुपाने का प्रयास करते हैं ।पटना साहिब से ही शत्रुघ्न सिन्हा चुनाल लड़ रहे हैं, और उस क्षेत्र में कायस्थों का जनाधार सबसे अधिक है ।दो हजार चौदह में शत्रुघ्न सिंह जब भाजपा के सीट से वहां भारी बहुमत से चुनाव जीते थे तो शत्रुघ्न सिन्हा ने सत्य का पक्ष लिया था ।पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के पक्ष में उन्होंने अपने संसदीय जीवन का सबसे बड़ा दांव भी खेला ।बड़े बड़े महारथियों और अनुभवी सांसदों का उन्होंने साथ भी दिया इसमें जसवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी आदि का साथ देकर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक तरह से पंगा ले लिया और इसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा ।पांच वर्ष तक भाजपा ने उन्हें सांसद तो माना लेकिन उपेक्षा किया ।पिछले लोकसभा चुनाव के पहले पूरे बिहार में उन्होंने दौरा किया था और जो आरक्षण के बाद से सबसे ज्यादा पीड़ित उपेक्षित कायस्थ समाज था ,उसको उन्होंने जोड़ने का काम किया और उन्होंने घोषणा भी की थी कि जिस भी दल से कोई भी कायस्थ खड़ा हो उसे कायस्थों को प्राथमिकता देना है और उसे अपना मत देना है ।यह घोषणा भी शत्रुघन सिन्हा के खिलाफ चला गया क्योंकि भाजपा ने कायस्थों को हमेशा ही अपने पॉकेट का वोट समझा है और कायस्थ भी पॉकेट के वोट बन कर रहे है।बिहार में शत्रुघ्न सिन्हा काफी लोकप्रिय हैं और उनकी बातों को कायस्थों ने बहुत ही प्रमुखता से लिया दो हजार चौदह के चुनाव में ,क्योंकि वे भाजपा में थे तो कायस्थों ने इसका परिचय भी दिया मोतिहारी से विनोद श्रीवास्तव चुनाव लड़े थे और काफी कायस्थों ने विनोद श्रीवास्तव को वोट दिया था।का इस बात को कायस्थ अच्छी तरह से समझ भी रहे हैं कि दलगत संकीर्णता में फंसने वाले अब कायस्थ नहीं हैं क्योंकि राजनेता कभी किसी दल में कभी किसी दल में चले भी जाते हैं ।इसका भी प्रभाव बिहार में कायस्थों के मानसिकता पर पड़ा है, क्योंकि कल तक जंगल राज का वास्ता देकर के जिस नीतीश कुमार ने चुनाव जीत कर के सत्ता संभाली उन्होंने फिर उस जंगल राज वाले दल से दोस्ती करके भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़कर भाजपा को शिकस्त दिया था ।वैसे भी यह माना गया है कि कलाकार जो होते हैं वे किसी दल या धर्म के संकीर्णता मे कैद नहीं रह सकते उनका दिल विशाल और व्यापक होता है वे हवा और बहते जल के समान होते हैं जिन्हें कोई भी दायरा अपने में कैद नहीं कर सकता ।
शत्रुघन सिन्हा सभी जाति धर्म का समर्थन लेते हुए अपने जाति के तमाम शिरोमणियों को एक मंच पर इकट्ठा किया और अपने सेवा भावना को उनके बीच रख कर के आश्वस्त किया कि जीतने के बाद मैं क्या क्या कार्य करुंगा।उन्होंने कहा कि कायस्थ के वोट को बांटने के लिए राज्यसभा सांसद रविशंकर प्रसाद को भाजपा ने दांव पर लगाया है जब कि रवि शंकर प्रसाद का टर्म अभी काफी लंबा बचा हुआ है। उन्होंने कहा कि कायस्थों को अब अपने मत का सही रूप में इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि कब तक हम किसी का पिछलग् गू बने रहेंगे !

 

अशोक वर्मा

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