शिवरात्री का आध्यात्मिक रहस्य, शिवरात्री पर विशेष

मोतिहारी। भारत मे शिवरात्री  का पर्व बडे हीं श्रद्धा से मनाया जाता है। सभी  शिवालयों मे सुबह से हीं कतार लग जाती है, और शिव शक्तियां मातायें बहनो के अलावां शिवभक्त पुरुष भी काफी संख्या मे जलाभिषेक के लिए लग जाते हैं। शिव का शाब्दिक अर्थ कल्याणकारी होता है।जब दुनिया मे पापाचार, अत्याचार और अनाचार परकाष्ठा पर चला जाता है यानि दुनिया घोर अंधियारे मे चली जाती है, जब कानून का राज्य समाप्त हो जाता है, जब धार्मिक अनुष्ठान काफी बढ़ जाते हैं और भगवान की भक्ति मात्र स्वांग भर का रह जाती है यानि भगवान और देवी देवताओं को सभी खूब मानते हैं लेकिन उनकी बातों को नहीं मानते। यही समय परमात्मा के अवतरण का होता है। और तब परम पिता परमात्मा शिव बाबा का अवतरण भारत की भूमि पर होता है, वे सच्चा गीता ज्ञान और  सहज राजयोग का अभ्यास कराकर अंधियारे से बिल्कुल हीं उजियारे मे ले जाते हैं। चूकि परमपिता परमात्मा शिव बाबा निराकार, अजन्मा, अभोक्ता और अशरीरी हैं। उनका आकार ज्योतिबिंदू है, इसलिए उनका अवतरण होता है और वह भी  साधारण तन मे होता है उनके अवतरण को हीं शिवजयंती या शिवरात्री कहते हैं। शिव बाबा अपने कार्य से बंधे होते है। गीताग्रंथ मे बताये “धर्म ग्लानि”के समय उनका अवतरण होता है। प्रत्येक पांच हजार वर्ष पर दुनिया जब बिलकुल हीं अंधियारा यानि कालायुग -कलयुग मे चली जाती है तब परमात्मा का अवतरण होता है और वेऔर पतित दुनिया को वहाँ से निकालकर उजाले यानि नई सतयुगी दुनिया मे भेजते हैं।इस बडे एवं पुनित कार्य की ऋणी आत्मायें द्वापर से शिवलिंग पर जल दूध चढ़ाती है। वह शिवबाबा के डोर मे खींची शिवालयों मे जाती है। शिवरात्री के अलांवा अन्य मौके जैसे सावन ,भादो सरस्वति पूजा आदि मे जलाभिषेक करने शिवालयों मे नारी एवं पुरुष काफी संख्या मे भागे भागे जाते हैं। शिव लिंग पर अक एवं धतुरा का फूल और बेलपत्र चढाने के पिछे का आध्यात्मिक रहस्य यह है कि अक एवं धतुरा का फूल जहर का प्रतीक है,जिसे कालकंटक एवं बाबुलनाथ शिव को अर्पण कर उससे मुक्त होने की कामना की भावना निहित होती है, बेलपत्र की तीन पत्तियां परमात्मा शिव की प्रथम रचना ब्रह्मा विष्णु और शंकर के प्रति सम्मान सूचक है। यही तीन पत्ती हीं शिवलिंग की तीन धारायें है।साधु संत महात्मायें अपने भृकुटी पर तीन धारा खींचकर उसके बीच परमात्मा के बींदी स्वरूप को लगाते हैं। प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्व विधालय के विहार एवं झारखंड राज्य प्रभारी राजयोगिनी बीके रानी दीदी ने शिवरात्री पर बताया कि धर्म ग्लानि माना अंधियारा और यही समय परमपिता परमात्मा के अवतरण का होता है।उनका अवतरण प्रत्येक पांच हजार वर्ष पर भारत की भूमि पर हीं होता है। उनके अवतरण और पतित दुनिया को पावन बनाने का यादगार पर्व है शिव जयंती।इसे हीं भक्तिमार्ग मे शिवरात्री  कहते हैं। पतित पावन परमपिता परमात्मा का इस कल्प का अवतरण 1936 मे हो चुका है।उनके द्वारा पतित दुनिया को पावन बनाने का कार्य विगत 84 वर्ष से चल रहा है जो अब अंतिम दौर मे है। भारत एक बार फिर से नई सतयुगी दुनिया बनने जा रहा है। इस कल्प का यादगार द्वापर मे फिर से शिवरात्री के रूप मे मनाना आरंभ होगा।

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