निस्वार्थ सेवा

 

मोतिहारी, 12-12-18,अशोक वर्मा ।

अमूमन ऐसा देखा जाता है कि राजनीति़क लाभ या निजी प्रसिद्धीऔर नाम के लिए हीं ज्यादातर लोग सामजिक सेवा कार्य करते है।देश विदेश से फंड लेने के लिए भी पंजीकृत स्वयं सेवी संस्था के लोग पांचसितारा होटल के एसी कमरे मे लजीज भोजन के बीच दलित एवं गरीबों  के लिए प्रोजैक्ट्स बनाकर मोटी राशी विभिन्न एजेंसियो के माध्यम से लेते हैं।धर्मशाला एवं मंदिरों के दिवालो पर निर्माण करने वालों के नाम का शिलापट्ट  निश्चित हीं दिखता है।ऐसे दौर मे अगर कोई संवेदनशील बृद्ध कड़ाके की ठंढ मे रात्रिकाल  के तीन चार बजे, जब सारे लोग गहरी नींद मे सोये रहते हैं तब चुपके से अपनी गाडी मे कंबलों का बंडल भरकर सन्नाटे को चीरता हुआ नगर के वैसे स्थलों पर रुकता है जहां रिकशा मजदूर  या सदर अस्पताल के बरामदे पर सीकुडते हुए अभावग्रस्त कोई सोया रहता है।ड्राइवर सीट से उतर गाडी के अंदर से कंबल निकालकर सोये हुए के वदन पर रख तुरंत अपनी गाडी स्टाटॅ कर वहाँ से फिर दुसरे ठीठूरते जरूरतमंद के पास पहुंच जाते हैं।इस संवाद के लेखक को इस बात की जानकारी पहले से  थी,लेकिन कौन है नाम पता आदि की जानकारी नहीं थी।एक दिन सुबह मानिॅंग वाक के दौरान यह आश्चर्यजनक नजारा दिखा फिर काफी समझानेऔर कहने पर उनहोंने मुझे साथ लिया और फोटो लेने पर सहमत हुए।
इस नेक कार्य को गुप्तरुप से करने वाले उम्र के 80 वर्ष पार कर चुके प्रयास संस्था के अवैतनिक उपाअध्यक्ष रामनाथ सिंह हैं जो कई धामिॅक और सामजिक ससंथानो से भी  जुडे हुए है।उनकी संस्था के लोगों को भी उनके इस गुप्त सेवा की जानकारी नही थी।प्रति वर्ष रामनाथ सिंह  काफी कंबल इसी तरीके से विगत एक दशक से बांटते चले आ रहे हैं।इस बावत प्रेरणा कहाँ से मिली इसपर बताया कि मुझे मेरे मां पिता के सेवा कार्य से प्रेरणा मिली।श्री सिंह ने बताया कि जब मै निर्माण कार्य की ठिकेदारी जंगल पहाड़ के पास करता था उसी समय मेरे मन के अंदर का सेवा संस्कार जगा था और मैने उन गरीबों की हर संभव सेवा भी की।संदेश मे बताया कि धन तो विनाशी है,लेकिन सेवा का फल अविनाशी है जो कई जन्मो तक दुआ के रूप मे मिलती है और वह सुरक्षा कवच का काम भी करती है,इसलिए सभी  को अपनी आय की कुछ राशी जरूरतमंदो की सेवा और ईश्वरीय कार्य मे निश्चित लगानी चाहिये ।

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