नेपाल नहीं चाहता कि नरेंद्र मोदी सरकार फिर आए?

भारत के लोकसभा चुनाव पर पड़ोसी देश नेपाल की भी नजर बनी हुई है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए थे तो काठमांडू के साथ रिश्ते उतार-चढ़ाव के दौर में थे हालांकि पांच वर्षों के कार्यकाल के अंत तक आते-आते दोनों देशों के संबंध संतोषजनक स्थिति में हैं.

मोदी ने जब नेपाल का पहला दौरा किया था तो लोग सड़कों पर उनकी एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े थे. नेपाल की संसद में पीएम मोदी के भाषण को खूब तारीफों के पुल बांधे गए और बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी में एक दोस्त देखा गया हालांकि कुछ समय बाद ही नेपाल में मोदी के लिए प्यार की जगह विरोध पनपने लगा.

जब नेपाल में नया संविधान पेश किया गया तो नेपाल-भारत के रिश्तों में दरार आ गई. नेपाल के संविधान में भारतीय मूल के मधेशियों के अधिकारों को नजरअंदाज किए जाने पर भारत ने नाराजगी जताई थी. मधेशियों के आंदोलन की वजह से भारत-नेपाल सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी हो गई थी जिसके लिए नेपाल ने मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया.

उस वक्त नेपाल विनाशकारी भूकंप से उबरने की कोशिश कर रहा था. सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी की वजह से नेपालियों की दैनिक जरूरतों की चीजों की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया था जिससे वहां मोदी सरकार विरोधी भावनाएं मजबूत हो गईं.

2015-16 में भारत-नेपाल सीमा पर हुई आर्थिक नाकेबंदी की प्रतिक्रिया में नेपाल चीन के करीब चला गया. नेपाल प्रमुख ओली ने चीन के साथ ट्रांजिट और ट्रांसपोर्ट समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसका मतलब था कि नेपाल की आपूर्ति व्यवस्था पर अब भारत का एकाधिकार खत्म हो जाएगा.

नेपाल की सत्ता के करीब राजनेता कांग्रेस को बीजेपी पर प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान की चीन समर्थक ओली सरकार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक चुनौती की तरह देखा जाता है.

एक साल बाद मोदी सरकार ने जब नोटबंदी का ऐलान कर दिया तो फिर एक बार दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई. नेपाल के भीतर नोट बदलने की सुविधा मौजूद ना होने की वजह से आम लोगों को बहुत नुकसान पहुंचा. भारत के वादे के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक नेपाली समकक्ष बैंक नेपाल राष्ट्र बैंक के साथ इस मुद्दे को सुलझाने में नाकामयाब रहा.

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