चुनाव के नतीजे जो भी निकलें, लॉन्ग टर्म के लिए इक्विटी में निवेश अच्छा

आम चुनाव अब कुछ ही महीने दूर हैं। हर चुनाव से पहले नतीजों को लेकर कयास लगते हैं। निवेशकों का मूड भी उसी हिसाब से बदलता है। मेरे विचार से निवेशकों का यह रुख बेबुनियाद है। अक्सर लोग पूछते हैं कि चुनाव के नतीजे नकारात्मक हुए तो बाजार का क्या होगा? इसका जवाब इतिहास में है। इसके लिए हम 35 वर्षों के चुनावी नतीजों और बाजार की चाल का विश्लेषण करेंगे।

2004 के नतीजों को छोड़ दें तो चुनाव के दौरान बाजार में निगेटिव रिटर्न वैश्विक घटनाओं के कारण रहा है। 1997 में एशिया का करेंसी संकट था, 2001 में डॉटकॉम का गुब्बारा फूटा और 2008 में लीमैन संकट से उपजी ग्लोबल आर्थिक मंदी थी। 2004 के चुनाव के बाद बाजार में तेज गिरावट और 2009 में तेजी रही थी। लेकिन मीडियम से लांग टर्म में देखें तो इसकी चाल सामान्य हो गई थी।

बाजार में एक चिंता है कि अगर 2019 के आम चुनाव में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा। ऐसा जनादेश पहले भी आया है। इसी वजह से 1996-99 के दौरान अल्पकालिक सरकार रही थी। लेकिन बीते 30 वर्षों का इतिहास देखें तो वैचारिक मतभेद होने के बावजूद ज्यादातर सरकारों ने आर्थिक सुधार का रास्ता नहीं बदला है।

एक और बात कही जाती है कि गवर्नेंस के लिए केंद्र सरकार का मजबूत होना जरूरी है। ऐसा कहना संघीय ढांचे की शक्ति और गवर्नेंस में इसकी भूमिका को कमतर आंकना है। बजट का आकार और राज्यों के लिए तय विषयों के हिसाब से देखें तो गवर्नेंस में राज्यों और स्थानीय निकायों की 60% हिस्सेदारी है। अब राज्य भी अपने यहां गवर्नेंस और बिजनेस का माहौल सुधारने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

किसी घटना विशेष के आधार पर निवेश के फैसले लेना ठीक नहीं होता है। निवेश के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे जरूरी है एसेट का एलोकेशन और बेहतर पोर्टफोलियो। एसेट एलोकेशन का मतलब है कि निवेश के किस साधन में कितना पैसा लगाया जाए। पोर्टफोलियो ऐसा हो कि निवेश पर जोखिम का असर कम से कम रहे।

बीते 10 वर्षों में ग्लोबल मार्केट में कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनका पहले से अनुमान नहीं था। आर्थिक संकट, यूरो जोन का संकट, फेड रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी और ब्रेक्जिट ऐसे ही इवेंट हैं। इसके बावजूद आर्थिक विकास और अच्छे कॉरपोरेट नतीजों के कारण बाजार बढ़ते रहे हैं।

कहने का मतलब यह कि लॉन्ग टर्म में बाजार का प्रदर्शन चुनावों पर निर्भर नहीं करता है। यह सरकार की नीतियों और उनके अमल से ज्यादा प्रभावित होता है। मेरे विचार से बीते चार वर्षों में जो ढांचागत सुधार हुए हैं, वे लंबे समय में बाजार को आगे ले जाने के लिए काफी हैं।

फिलहाल कच्चा तेल और करेंसी बाजार को ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। अगर इन्फ्रास्ट्रक्चर, हाउसिंग और ग्रामीण क्षेत्र पर केंद्र और राज्यों के खर्चों को देखें तो अर्थव्यवस्था डिमांड बढ़ने के रास्ते पर ही जाती दिख रही है। इसलिए इक्विटी को लेकर हमारा नजरिया सकारात्मक है।

चुनावी नतीजे बाजार की पसंद के अनुरूप नहीं आए तो कुछ समय के लिए बिकवाली हो सकती है। लेकिन मजबूत बुनियाद और क्वालिटी निवेश से लांग टर्म में पोर्टफोलियो पर रिटर्न अच्छा ही रहेगा

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