5 साल में 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी PM मोदी का लक्ष्य, चीन को 3 साल में मिली सफलता

प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक सभी देश को अगले पांच साल में ‘फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ यानी 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कर रहे हैं. अमेरिका, चीन सहित कई देश काफी कम समय में यह लक्ष्य हासिल कर चुके हैं.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को साल 2019-20 का बजट भाषण देते हुए कई बार देश को अगले पांच साल में ‘फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ यानी 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही. इसके अगले दिन शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए भी इसी को देश का बड़ा लक्ष्य बताया. अमेरिका, चीन सहित कई देश काफी कम समय में यह लक्ष्य हासिल कर चुके हैं. आइए जानते हैं कि आखिर भारत साल 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश कैसे बन सकता है और इसके रास्ते में क्या हैं संभावनाएं और अड़चनें?

बीजेपी सरकार और पीएम मोदी ऐसे न्यू इंडिया की बात करते हैं जिसमें तेज ग्रोथ होगा. काशी में तो पीएम मोदी ने यहां तक कह दिया कि जो लोग अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की होने पर सवाल कर रहे हैं, वे निराशावादी हैं. लेकिन इस बारे में जानकार पॉजिटिव और निगेटिव दोनों पक्ष उठा रहे हैं.

पीए मोदी ने कहा कि देश को एक ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने में 55 साल लग गए और सिर्फ पिछले पांच साल के शासन में ही अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गई. यह बात सच भी है, पिछले पांच साल के मोदी सरकार के दौरान अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर 2.7 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया.

चीन के रास्ते पर पीएम!

गौरतलब है कि अमेरिका को 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनने में नौ साल (1979 से 1988) लग गए, जापान को आठ साल (1987 से 1984) और चीन को महज तीन साल (2005 से 2008) लगे थे. इससे यह संदेश मिलता है कि चीन अगर तीन साल में यह मुकाम हासिल कर सकता है,  तो भारत पांच साल में ऐसा क्यों नहीं कर सकता. भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है और कुछ समय के लिए तो हम चीन को पीछे छोड़ चुके हैं. हालांकि, पिछले कई साल से जीडीपी में बढ़त अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रही.

कैसे मापा जाता है अर्थव्यवस्था का आकार

किसी देश की अर्थव्यवस्था के आकार को उसकी कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से मापा जाता है. यानी जितना कुल सकल घरेलू उत्पाद, उतना ही अर्थव्यवस्था का आकार. सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी एक वित्तीय वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित कुल वस्तुओं और सेवाओं का कुल जोड़ होता है. इसे ही अर्थव्यवस्था का आकार मानते हैं और इसमें बढ़त की दर को ही अर्थव्यवस्था की तरक्की की दर मानी जाती है.

जीडीपी को इस तरह से मापते हैं: GDP=खपत+निजी निवेश+सरकारी खर्च+निर्यात-आयात. यानी किसी देश की खपत, निजी निवेश, सरकारी खर्च और निर्यात को जोड़ने के बाद उसमें से आयात को घटा दें तो यह उसकी जीडीपी या अर्थव्यवस्था का आकार होता है.

8 फीसदी की चाहिए ग्रोथ

आर्थ‍िक सर्वे में यह कहा गया है कि 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने के लिए देश को अगले वर्षों में 8 फीसदी की तेज ग्रोथ हासिल करनी होगी, जबकि 2018-19 में जीडीपी की बढ़त दर महज 6.8 फीसदी थी. इतनी तेज ग्रोथ रेट हासिल करने के लिए निवेश काफी बढ़ाना होगा और बजट में सरकार ने विदेशी निवेश बढ़ाने की बात कही है. इसका संदेश यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार अगले दिनों में विदेशी निवेश का जमकर स्वागत करेगी. इसका मतलब यह है कि पूंजी बाजार में कई सुधार करने होंगे. विदेशी और घरेलू निवेश को बढ़ाने के लिए डेट बाजार में सुधार होगा, एफडीआई की सीमा बढ़ाई जाएगी और एफआईआई निवेश के नियमों में नरमी बरती जाएगी.

अर्थव्यवस्था पर गौर करें तो खपत में कमी आ रही है, कारों और मकानों की बिक्री डाउन है. कंस्ट्रक्शन सेक्टर में इतनी कमाई नहीं हो रही कि ग्रोथ को बढ़ावा मिले. लेकिन बजट में 2022 तक सभी गरीबों को मकान देने का जो वादा किया गया है, उससे हो सकता है कि इस सेक्टर में तेजी आए. फिर भी जानकार कहते हैं कि लो वैल्यू निर्यात को बढ़ावा देने, जीएसटी में सुधार, भूमि सुधार, स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार, बुनियादी ढांचे के तेज विकास जैसे उपायों से इस लक्ष्य पर तेजी से आगे बढ़ा जा सकता है.

देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी ग्रामीण है और इन इलाकों में पिछले पांच साल में लोगों की आय स्थिर है. पीएम किसान योजना के तहत मिलने वाले 6,000 सालाना रकम का कुछ खास असर नहीं हुआ है. बजट में ‘जीरो बजट फार्मिंग’ के अनूठे उपाय से किसानों की आय 2022 तक डबल करने की बात कही गई है, उसकी सफलता पर यह निर्भर करता है कि रूरल इकोनॉमी में कितनी बढ़त होगी.

निजी निवेश

निजी निवेश में गिरावट देखी गई है. कारोबारी निवेश के लिए उत्साह नहीं दिखा रहे और बैंक कर्ज देने को अनिच्छुक हैं. गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) में संकट से नकदी की हालत तंग हुई है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई में ग्रोथ उपयुक्त दर से नहीं हो पा रही है.

MSME सेक्टर की हालत खराब

MSME सेक्टर नोटबंदी और जीएसटी के असर से अब तक हलकान है. इन सबकी वजह से रोजगार सृजन नहीं हो रहा, बेरोजगारी के 45 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की खबरें आई हैं. खपत न बढ़ने की एक वजह बेरोजगारी भी है.

सरकारी खर्च

चुनाव से पहले यानी पिछली मोदी सरकार में सरकारी खर्चों पर हाथ रोक लिया गया था. सरकारी निवेश का जीडीपी ग्रोथ बढ़ाने में बड़ा असर होता है. बजट में यह कहा गया है कि अगले पांच साल में बुनियादी ढांचे में 100 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा, लेकिन पैसा कहां से आएगा, इसके बारे में अभी कुछ साफ नहीं है. सरकार ने सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश की बात कही है. रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचा सेक्टर में पीपीपी के द्वारा निजी निवेश की बात कही गई है, लेकिन इस सेक्टर की दिग्गज कंपनियां खुद परेशान चल रही हैं, इसलिए वे इनमें कोई उत्साह नहीं दिखा रहीं.

निर्यात में सुस्ती

निर्यात ग्रोथ में लगातार सुस्ती बनी हुई है और जीडीपी के अनुपात के हिसाब से यह 14 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है. वैश्विक सुस्ती और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ वॉर की वजह से अभी कुछ समय तक निर्यात में तेज बढ़त की गुंजाइश भी नहीं दिखती. दूसरी तरफ, कच्चे तेल के आयात की वजह से हमारा आयात बिल साल में कई लाख करोड़ का बना हुआ है, जिसे पीएम मोदी ने भी स्वीकार किया है. अगले पांच साल में तो यह संभव नहीं लगता कि इलेक्ट्र‍िक वाहनों को देश में अचानक अपना लिया जाए और इस बिल में भारी गिरावट आए. जानकार कहते हैं कि इसके लिए लो वैल्यू निर्यात पर जोर देना होगा, जैसा कि विकसित देशों के इतिहास से सबक मिलता है.

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