तीन तलाक पर चर्चा आज, सरकार को इसी सत्र में संसद से विधेयक पारित होने की उम्मीद

नई दिल्ली. तीन तलाक बिल पर गुरुवार को लोकसभा में चर्चा होगी। भाजपा ने अपने सांसदों को व्हिप जारी कर सदन में मौजूद रहने को कहा है। सरकार इसे गुरुवार को ही लोकसभा से पारित कर अगले हफ्ते राज्यसभा में पेश करना चाहती है। सरकार को उम्मीद है कि यह बिल इस सत्र में राज्यसभा से पास हो जाएगा, क्योंकि नए बिल में विपक्ष की चिंताओं का ध्यान रखा गया है।

विधेयक पास नहीं हुआ तो सरकार को फिर अध्यादेश लाना पड़ेगा

  1. सरकार ने तीन तलाक को अपराध करार देने के लिए सितंबर में विधेयक पारित किया था। इसकी अवधि 6 महीने की होती है। लेकिन अगर इस दरमियान संसद सत्र आ जाए तो सत्र शुरू होने से 42 दिन के भीतर अध्यादेश को बिल से रिप्लेस करना होता है। मौजूदा संसद सत्र 8 जनवरी तक चलेगा।
  2. 16 महीने पहले आया था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की 1400 साल पुरानी प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था और सरकार से कानून बनाने को कहा था। सरकार ने दिसंबर 2017 में लोकसभा से मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक पारित कराया लेकिन राज्यसभा में यह बिल अटक गया, जहां सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है। विपक्ष ने मांग की थी कि तीन तलाक के आरोपी के लिए जमानत का प्रावधान भी हो।

  3. इसी साल अगस्त में भी यह विधेयक लोकसभा से पारित हुआ लेकिन राज्यसभा में अटक गया। इसके बाद सरकार सितंबर में अध्यादेश लेकर आई। इसमें विपक्ष की मांग काे ध्यान में रखते हुए जमानत का प्रावधान जोड़ा गया। अध्यादेश में कहा गया कि तीन तलाक देने पर तीन साल की जेल होगी।
  4. बिल में ये बदलाव हुए

    अध्यादेश के आधार पर तैयार किए गए नए बिल के मुताबिक, आरोपी को पुलिस जमानत नहीं दे सकेगी। मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। उन्हें पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा।

  5. बिल के मुताबिक, मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा। तीन तलाक का अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफआईआर दर्ज कराएं।
  6. जनवरी 2017 से सितंबर 2018 तक तीन तलाक के 430 मामले सामने आए थे। इनमें 229 मामले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले और 201 केस उसके बाद के हैं।

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