अपने इन फ़ैसलों के लिए याद किए जाएंगे जस्टिस दीपक मिश्रा

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा का कार्यकाल दो अक्तूबर 2018 को ख़त्म हो गया. जस्टिस रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के नए न्यायाधीश होंगे.

जस्टिस दीपक मिश्रा का कार्यकाल काफ़ी उतार-चढ़ाव भरा रहा. उनके ख़िलाफ़ महाभियोग लाने की कोशिश की गई. दूसरी तरफ़ कई जजों ने उनका विरोध भी किया.

जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कई ऐतिहासिक फ़ैसले भी दिए. ये फ़ैसले हैं- समलैंगिकता और अडल्ट्री (व्यभिचार) को अपराध के दायरे से बाहर लाना और सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से पाबंदी हटाना.

क्या कुछ अहम हुआ उनके कार्यकाल के दौरान, एक नज़र उन मामलों और घटनाओं पर-

1. समलैंगिकता नहीं रहा अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि आपसी सहमति से दो समलैंगिकों के बीच बनाए गए संबंध को अपराध नहीं माना जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार रमेश मेनन कहते हैं, “कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर रखा और एलजीबीटी समुदाय को अपनी सेक्शुअल पसंद या नापसंद के बारे में बात करने का क़ानूनी और संवैधानिक अधिकार दिया.”

2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इसके विरोध में 30 से ज़्यादा याचिकाएँ दाख़िल हुई थीं. ये कानूनी लड़ाई 24 साल चली.

2.‘महिला की देह किसी की जागीर नहीं’

दूसरा मामला व्यभिचार का है. ये क़ानून साल 1860 में बना था. जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खनविलकर, जस्टिस आर एफ़ नरीमन, जस्टिस इंदू मल्होत्रा और जस्टिस चंद्रचूड़ की बेंच ने इस क़ानून पर फ़ैसला देते हुए कहा कि धारा 497 संविधान के ख़िलाफ़ है.

मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस खानविलकर ने कहा, “हम आईपीसी की धारा 497 और आपराधिक दंड संहिता की धारा 198 को असंवैधानिक क़रार देते हैं.”

कोर्ट ने इसे मनमाना क़ानून बताया और कहा कि ये समानता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है. कोर्ट का कहना था कि अडल्ट्री यानी व्यभिचार तलाक़ का आधार तो हो सकता है, लेकिन अपराध नहीं है.

कोर्ट ने इस मामले में जो कहा वो बेहद महत्वपूर्ण था. रमेश मेनन कहते हैं, “कोर्ट ने कहा है कि महिला की देह पर उसका अपना हक़ है और इसके साथ समझौता नहीं किया जा सकता है. पवित्रता सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं है और ये समान रूप से पतियों पर भी लागू होती है.”

वरिष्ठ पत्रकार अनूप भटनागर कहते हैं, “समलैंगिकता और व्यभिचार के दोनों मामलों में निजता के अधिकार पर अधिक ज़ोर दिया गया है और निजता को मौलिक अधिकार बताया गया है.”

3. सबरीमला में जा सकेंगी महिलाएं

केरल के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित किए जाने को चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने असंवैधानिक क़रार दिया.

कोर्ट के मुताबिक़ मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और “हर किसी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए.”

4. प्रमोशन में आरक्षण

इनके अलावा जिन महत्वपूर्ण मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले आए उनमें आरक्षण और आधार का मामला प्रमुख था.

आरक्षण

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्य वाली संवैधानिक पीठ ने केंद्र और राज्य सरकारों में नौकरी कर रहे अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) के नागरिकों के लिए प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता साफ़ कर दिया.

कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में बराबर अवसर देने वाले प्रावधानों के अनुसार प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जा सकता है.

अदालत ने केंद्र सरकार की अर्ज़ी को ठुकरा दिया कि नौकरियों में प्रमोशन के कोटे के लिए एससी-एसटी की कुल आबादी को ध्यान में रखा जाए. अदालत ने कहा कि प्रदेश सरकारों को एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन देने के लिए अब पिछड़ेपन का डेटा जुटाने की ज़रूरत नहीं है.

5. कुछ जगहों पर निराधार हुआ आधार

आधार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे निजता को ख़तरा नहीं है. चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने आम लोगों को राहत देते हुए इसे कुछ जगहों पर ग़ैरज़रूरी क़रार दिया.

आधार

सरकार और निजी कंपनियों ने कई सुविधाओं के लिए आधार नंबर को ज़रूरी बना दिया था. कोर्ट ने ख़ास कर बैंकों और स्कूलों में आधार नंबर की जानकारी दिए जाने को ग़ैरज़रूरी बना दिया.

सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों वाली संवैधानिक बेंच में से चार जजों ने बहुमत से इस मामले में कहा कि बैंक अकाउंट और मोबाइल नंबर को आधार से जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है और किसी भी बच्चे को आधार नहीं होने पर सरकारी योजनाओं का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता है.

हालांकि आयकर रिटर्न भरने के लिए पैन के साथ-साथ आधार नंबर ज़रूरी रहेगा.

6. बाबरी मस्जिद से जुड़ा इस्माइल फ़ारूक़ी मामला

बाबारी मस्जिद मामले में मुसलमानों के एक पक्ष ने अपील की थी कि 1994 में इस्माइल फ़ारूक़ी फ़ैसले को पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच को भेजा जाए.

बाबरी समस्जिद का विवादित ढांचा

सुप्रीम कोर्ट ने दो-एक से विभाजित फ़ैसले में इसे पांच या अधिक जजों की बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया.

अनूप भटनागर कहते हैं, “इसका कोई असर राम जन्मभूमि मामले पर नहीं पड़ेगा. ये मूल मामले के तहत ज़रूर उठाया गया था लेकिन उससे अलग ही था.”

हालांकि रमेश मेनन इस राय से इत्तेफाक़ नहीं रखते. वो कहते हैं, “इस तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव में इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि राजनीतिक पार्टियां इसका फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगी.”

वो कहते हैं, “कोई भी फ़ैसला अंतिम नहीं होता है. दोबारा विचार करने का मौक़ा बने या किसी ने गुज़ारिश की तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस पर फिर से विचार किया नहीं जाएगा .”

7. मॉब लिंचिंग मामलों में सरकार से पूछे सवाल

इसी साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पूछा कि उन्होंने गाय के नाम पर हिंसा और मॉब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर उसके पिछले निर्देशों का पालन किया या नहीं.

कथित गोरक्षक (फ़ाइल फ़ोटो)

17 जुलाई के अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग और गायों को लेकर हिंसा पर अपने निर्देश दिए थे.

चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खनविलकर और डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “लोगों को इसका अहसास होना चाहिए कि भीड़ की हिंसा और क़ानून हाथ में लेने से आप क़ानून के प्रकोप को आमंत्रित कर रहे हैं.”

8. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी

इसी साल अगस्त में महाराष्ट्र पुलिस ने देश के अलग-अलग हिस्सों में छापे मारे और पांच प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवर राव, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा को गिरफ़्तार किया.

सुधा भारद्वाज

चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खनविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने 2-1 की बहुमत से उन्हें ज़मानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया.

बेंच का कहना था कि सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि उन्हें सत्ताधारी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के लिए गिरफ़्तार नहीं किया गया है, बल्कि प्रतिबंधित माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

हालांकि, इस मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ की राय जुदा थी. उनका कहना था गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं को बदनाम करने में पुलिस ने असंगत रवैया अपनाया है और इसकी जांच के लिए विशेष जांच दल के गठन की ज़रूरत है.

9. बलात्कार मामले में दया की अर्जी ख़ारिज

निर्भया बलात्कार और हत्या मामले में जिन चार लोगों को दोषी पाया गया था, उनकी दया याचिका को नामंज़ूर कर दिया गया था.

कोर्ट ने दोषियों की फांसी की सज़ा बरक़रार रखी और कहा कि उनके लिए फांसी की सज़ा सही है.

निर्भया की मां

इस मामले में जस्टिस भानुमति की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था, “इस बर्बरता के लिए माफ़ी नहीं दी जा सकती, अगर किसी एक मामले में मौत की सज़ा हो सकती है तो वो यही है. निर्भया कांड सदमे की सुनामी था.”

10. इच्छामृत्यु को मिली अनुमति

इच्छामृत्यु यानी यूथेनीसिया को सुप्रीम कोर्ट ने क़ानूनी मान्यता दे दी और कहा कि व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार है.

इच्छामृत्यु

कोर्ट ने इसके लिए ‘पैसिव यूथेनेसिया’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिसका मतलब होता है किसी बीमार व्यक्ति का मेडिकल उपचार रोक देना ताकि उसकी मौत हो जाए. हालांकि इसे लेकर ज़रूरी गाइंडलाइंस क्या हैं, ये अभी अस्पष्ट हैं.

इस मामले में याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कृत्रिम साधनों के ज़रिए मरीज़ को ज़िंदा रखने की कोशिश से सिर्फ़ अस्पतालों को पैसा कमाने की सुविधा मिली है.

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