नई सरकार के लिए नामुमकिन कुछ भी नहीं, आर्थिक विकास में मजबूती देने का वक्त

भरोसा। शायद यही उपयुक्त शब्द होगा जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान देश के नागरिकों के मन और दिल में जगाया। अपने मन से, वाणी से और कर्म से। देश के दुश्मनों की आंख में आंख डालकर बात करने की बात हो, राष्ट्रीय सुरक्षा की बात हो या उज्ज्वला और आयुष्मान जैसी तमाम कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने की बात हो।

सरकार की कार्यशैली और आत्मविश्वास ने लोगों में यह भरोसा पैदा किया कि नामुमकिन कुछ भी नहीं। अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर भारत की बढ़ती साख पर देश इतराया। नदियों और जलस्रोतों और साफ-सफाई सहित पर्यावरण के मोर्चे पर सरकार की साफगोई और निष्ठा ने लोगों का दिल जीता। सब कुछ अच्छा हुआ, जो नहीं हुआ उसके लिए महज पांच साल की समयावधि के तर्क को कुतर्क तो कतई नहीं कहा जा सकता है। तभी तो लोगों ने इस समयावधि को और बढ़ा दिया है। न सिर्फ बढ़ाया बल्कि इस लायक बनाया कि खुद के विवेक से सरकार सख्त से सख्त फैसले से भी परहेज न करे। उनको लग रहा है कि अब तो उनका कल्याण मुमकिन है।

उनकी अपेक्षाएं वोट और सीटों में हुई गुणात्मक वृद्धि से बनी सरकार के अनुरूप ही बढ़ी हैं। पहले कार्यकाल में लोगों और राष्ट्र के कल्याण का जो मजबूत तानाबाना रचा गया, उसे अब मजबूती देने का वक्त आ गया है। नामुमकिन कुछ भी नहीं। क्योंकि अब जनता ही बोलने लगी है, मोदी है तो मुमकिन है। ऐसे में नई सरकार के सामने विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी चुनौतियों और उसके समाधान की जरूरत है।

नरेंद्र मोदी दूसरी बार सरकार संभालने के लिए तैयार हैं। इस मोड़ पर उनके सामने क्या आर्थिक चुनौतियां हैं और वे इनसे कैसे जूझ सकते हैं, ये जानना काफी जरूरी है।

गिरता उपभोग
पिछले कुछ महीनों से उपभोग मंदी नजर आ रही है। ये कार, स्कूटर, मोटरसाइकिल और ट्रैक्टरों की गिरती बिक्री में देखी जा सकती है। उपभोग भारतीय अर्थव्यवस्था का करीब 55-60 फीसद हिस्सा है। इसलिए उपभोग में थोड़ी मंदी आना भी चिंता का विषय है।

समाधान
जानकारों का कहना है कि इस वित्तीय वर्ष में सरकार को अपना व्यय बढ़ाना चाहिए। 2008-2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने ऐसा ही किया था। उसके बाद कई वर्षों तक देश को उच्च मुद्रास्फीति सहनी पड़ी थी। रिजर्व बैंक द्वारा इस साल दो बार रेपो रेट घटाने के बावजूद उपभोग मंदी खत्म नहीं हुई। मेरा ये मानना है कि नयी सरकार को इस मुद्दे से दूर रहना चाहिए। कभी-कभी, कोई भी सरकारी हस्तक्षेप सर्वोत्तम संभव समाधान नहीं बन पाता है।

बदहाल बैंक
सरकारी बैंक काफी साल से खराब स्थिति में है। दिसंबर 31, 2018, को इन बैंकों का फंसा कर्ज करीब 8,64,433 करोड़ रुपये था। पिछले दो वित्तीय वर्षों में सरकार ने इन बैंकों में 2,06,000 करोड़ का रीकैपिटलाइजेशन किया है। इस नए निवेश से इन बैंकों में थोड़ी बहुत जान आयी है।

समाधान 
सरकार, बैंकों को उनके बुरे ऋणों को ठीक करने में मदद करने के लिए इनसॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड लाई थी। इसने सबसे बड़े डिफॉल्टर भूषण स्टील को टाटा स्टील को बेचकर, एक सही नोट पर शुरुआत की। इससे बैंकों ने अपने बकाये का लगभग 63 फीसद हिस्सा वसूला। इस कोड को ठीक से लागू किया जाना चाहिए।

आर्थिक विकास
आज विकसित हुए हर देश ने निर्यात के रास्ते ही यह लक्ष्य हासिल किया। पहले देश कम मूल्य वाले लेबर इंटेसिव एक्पोर्ट से शुरू होता है और फिर धीरे-धीरे उच्च मूल्य वाले निर्यात की तरफ बढ़ता है। कम मूल्य का निर्यात बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करता है। हाल के वर्षों में, भारत ने कम मूल्य के निर्यात के मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है।

समाधान 
श्रम-गहन निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए श्रम सुधार की दरकार है। 200-250 लोगों को रोजगार देने वाली छोटी कंपनियों को श्रम कानूनों के पालन में कुछ राहत दी जानी चाहिए। इससे रोजगार बढ़ेगा। और अंत में एक बात। भारत में अक्सर सरकारों के साथ समस्या यह रही है कि वे बहुत सारी चीजें करने की कोशिश करती हैं। लेकिन एक अवसर है इस नई मोदी सरकार के पास, जो कुछ चीजें ही करे लेकिन पर्याप्त पैमाने पर और सही करे।

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