तुम कब आओगे?

समय सिमटा सुध में,
जीवन उलझा गुथ में।
त्याग गए थे जिस राह में,
वही खड़ी उसी चाह में।
सजी बांह को अपनाने तुम कब आओगे?
बुझे दिए की बाती सुलगाने तुम कब आओगे?
आती है सुध; जब हे प्राण प्रिये ,
चुभते हैं उर में सहस्त्र बाण प्रिये।
असहनीय अब वियोग की पीड़ा है,
उर के व्याधी इन घावों में,
औषधी लगाने तुम कब आओगे?
वर्षो से तड़पी निज नार को,
मुक्त कराने तुम कब आओगे?
किन्तु …
नीहार नीखर नभ किरणों को,
भर उठता है मन आशाओ से।
पुनः दृढ़ हो कहता है,
तुम अवश्य आओगे;
इन्ही -किन्ही दिशाओ से।

डॉ सुनील – 9766938085

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