Poetry Update: आखिर मै कब जाऊँगा घर दीवाली मनाने

आखिर मै कब जाऊँगा घर दीवाली मनाने
जब जब देखता हूँ मैं बच्चों को खेलते पटाखों संग,
लड़ते झगड़ते रंग बिरंगी  फुलझड़ीयों के लिए,
दीये रखते घर के कोने कोने पर,
द्वार सजाते टमटमाती लड़ियों से,
कील बतासों की थाली पर झपट्टे मारते,
मेरा मन उदास-निराश हो जाता है,
बचपन की यादों में खो जाता है।
आखिर मैं कब जाऊूँगा घर,
अम्मा की गुजिया खाने,
पापा से नजर बचाते छोटू संग हिढलाने,
सुनने गुड़िया के किस्से नए पुराने,
मिल मित्रो संग दिवाली त्योहार मनाने।
श्री राम को भी मुझ जैसा ही चला गया था,
वो सौतेला माँ; मैं बेरोजगारी डायन के कारण घर से चला गया था।
क्या कभी मेरा भी रावण मारा जाएगा??
वनवास खत्म क्या कभी मेरा भी हो पायेगा।

डॉ. सुनील शर्मा 9766938085

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