चुनाव पर कविता: चुनाव सामयिकी!

नेता गंदी सोच भरे है , सत्ता सुख मन भारी है!
बढ़ी कामना मिले सहारा , धन कुबेर बलिहारी है!
राम राज का सपना मीठा , सारी मुश्किल प्यारी है!
नयी मलाई दे दो फिर से , चाट़े सब तैयारी है!!१

छेड़ी वीणा जाति धर्म की , गोत्र उठे जो सोये थे !
भेद भाव की वर्षा प्यारी , मेघ उमड़ते भाते थे !
अधम श्रेष्ठ की आँधी उठती , अंध भक्त मदमाते थे !
जाग उठी सपनो की ज्वाला , गंगा मे नहलाते थे!! २

स्वरचित
छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!

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