Poetry: मुझे अफ़सोस न हो के मैं बेटा नहीं एक बेटी हूँ…

समाज की छोटी मानसिकता की शिकार हूँ

शालीन हूँ परिपूर्ण हूँ फिर भी एक विकार हूँ

मेरी क्षमताओं पे सवाल क्यों?

मेरी तवज्जों पे बवाल क्यों?

हर ख़ुशी पाकर भी रोता हु

अफ़सोस! के मैं बेटा नहीं एक बेटी हूँ…

हर बार मैंने समझा है हर बार मैंने माना है

झुकना तोह मुझे ही है बस यही मैंने जाना है

जो हो रहा है ये हर बार क्यों?

जब कोई समझ नहीं सकता तोह ये दुनिया संसार क्यों?

मैं हमेशा ही उपेक्षित होती हूँ

अफ़सोस! के मैं बेटा नहीं एक बेटी हूँ…

खिलोने की चाहत नहीं आपके ख्यालों की चाहत है

ममता की मोहताज़ हूँ के मेरा मन आहट है

पापा से शिकायत क्यों माँ तुम तोह समझ लेती

तुम भी कभी बेटी थी उसका दर्द समझ लेती

अपने भाई से बड़ी हूँ फिर भी मैं छोटी हूँ

अफ़सोस! के मैं बेटा नहीं एक बेटी हूँ…

कभी गिराते हो कभी जलाते हो

मैं एक लड़की हूँ बार बार यह एहसास दिलाते हो

मेरा बार बार अपमान क्यों?

ऐसे पुरषार्थ पे अभिमान क्यों?

मुझे पलने दो मुझे रहने दो

प्रकृति के चक्र को चलने दो

मुझे मेरा अधिकार चाहिए

मुझे थोड़ा सा प्यार चाहिए

मैं आपसे हाथ जोड़ती हूँ

की मुझे अफ़सोस न हो के मैं बेटा नहीं एक बेटी हूँ…!!

-सचिन विश्वकर्मा

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