Poetry Update: आज पर्वों के मुख यूँ बदल क्यों गए?

आज पर्वों के मुख यूँ बदल क्यों गए?

एक ऊर्जा  असीमित  किरण  आस की

त्याग   एकाकीपन   मन   सलोने   भए

हाय !  निर्मम समय दर समय बदलियाँ

आज पर्वों के मुख यूँ  ..बदल क्यों गए?

 चैत्र   चरितार्थ   चित्रण   चरित्रों  का  है

फिर धवल साख पर ये अमावस है क्यों?

खण्ड – मर्यादा ,  फूहड़  नचनिया   जुटा

ये  नियम  बद्धता  पर  ..मलिमास क्यों?

रंग  फिर  से  सजा दो   जो  धूमिल भए

आज पर्वों के मुख यूँ …

पञ्चमी – नाग  अल्हड़ सी  वो कुश्तियाँ

तीज कजरी में बचपन की सब मस्तियाँ

बनती  राखी पे  घर की सिवईयां  कहाँ?

और कहां खो गई सब की सब कश्तियाँ

 उन  रिवाजों को  ला दो  जो हैं  खो गए

 आज पर्वों के मुख यूँ ….

अजब ग्लैमरस की चमक से हैं लिपटे

नए  संस्करण  मे  हैं   संस्कार  चिपटे

न मधुरिम कोई आस  एहसास अब है

गजब! आधुनिकता में  परिवार निपटे

है  रस्मों  रिवाजों का  परिहास  केवल

पुरखों की निशानी का उपहास केवल

मिलावट,  मिठाई,  जहर खास केवल

न  माटी के दीपक,  है फीकी सी बत्ती

न  रिश्तों की  खुश्बू , चमक  एक रत्ती

फिर  .बदल दो उन्हें ..जो बदल हैं गए

आज पर्वों के मुख यूँ ..

 

रचना – राजेश तिवारी, रीवा, म०प्र०

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