सैन्य वेदना – अपमानित शोणित सैनिक कब …

” नेता हो या आम जनों के भाषण में होता है,
अपमानित शोणित सैनिक कब अपना दुःख रोता है ! ,,

अंगड़ाई यौवन ने जब ली मीठे फल भी खा सकता था,
बागों में कलियाँ महकी थीं उपवन उसको भा सकता था !,,
उधर क्षुधा गर मकसद होता बहुतेरे पथ जा सकता था,
मगर जुनून अलग था उसका जिसको भांप गया था वो,
चीख सुनी थी मातृभूमि की सुनकर कांप गया था वो !,,
निज जीवन आहुति की समिधा लेकर वह निस्वार्थ चला
निकल पड़ा था अर्पण को करने वह परमार्थ चला !,,
ऐसे में कोई प्रश्न उठाए मन व्याकुल होता है
अपमानित शोणित सैनिक कब …||१||

सुबह शाम जीवन मस्ती में फूहड़ गाने गाते हैं,
तब जब उम्र में उसकी बच्चे सिने-हॉल में जाते हैं !,,
वह शर्ते उत्तीर्ण हुनर से कठिन प्रशिक्षण पाता है,
इक-इक दिन ढ़लने से पहले पुनर्जन्म हो जाता है !,,
अस्त व्यस्त मदमस्त बना वह मिट्टी में सन जाता है,
अडिग स्फूर्ति का वह प्रतिम हिमगिरि सा तन जाता है !,,
सीना की जैसे चट्टाने फौलादी बन जाता है,
सैन्य नियम से जब वह सजता तब सैनिक कहलाता है !,,
कर बलिदान बलिवेदी पर सपनों को वह खोता है
अपमानित शोणित सैनिक कब …||२||

खत्म हुआ जब कठिन प्रशिक्षण कार्यक्षेत्र को जाता है,
निर्धारित नियमों पर चलकर वह कर्तव्य निभाता है !,,
सैन्य धर्म की कसमें खाई वह जिसका निर्वाह किया,
रक्त का हर कतरा अर्पण कर उसने जीवन दाह किया !,,
कड़कड़ सर्द थपेड़े खाकर धमनी हिम बन जाती है,
रौद्र रूप वर्षा का तांडव कायनात घबराती है !,,
वह फौलाद डटा रहता है मातृभूमि इठलाती है,
जेठ माँह तपती दोपहरी क्षितिज अनल बोता है !,,
अपमानित शोणित सैनिक कब …||३||

प्रतिपल ही संकल्पित जिसका आदेशित है कदम-कदम,
हस्त थाल में प्राण सजाकर तत्पर रहता जो हरदम  !,,
वह निश्चल ले बृहद भार कठिन वेदना सह जाता है,
लोग जहां अमृत जांचे जहर भी खुशदिल पी जाता है !,,
मोह-प्रेम का बंधन घर ही त्याग राष्ट्र का गाता है,
सीमा पर वह डट कर केवल अपना कर्ज चुकाता है !,,
बाद शिखर के प्रतिद्वंदी से घमासान होता है,
द्वन्द समर का भीषण की फिर आर पार होता है !,,
अपमानित शोणित सैनिक कब …||४||

हाय ! ग्लानि की गरिमा देखो माँ वो पुत्र खोती है,
जब सुहाग पर फक्र जताकर विधवा भी रोती है !,,
पिता कि नम अवसाद नेत्र में शोक जटिल होता है,
बेटे का संबल खोता है तब वह बेदम रोता है !,,
मित्रों ने भी मित्र तजा भाई का भाई सोया था,
इश्क के कुछ पन्ने बाकी चंदा ने सूरज खोया था !,,
तब प्रपंच उन्माद लुटेरे उपहास नीति भरते हैं,
स्वाभिमानी बलिदानी पर बाजारू कीमत करते हैं !,,
देख राष्ट्र की दशा कहें क्या ? विचलित मन होता है,
अपमानित शोणित सैनिक कब …||५||

रचना – राजेश तिवारी | 7307736510

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WhatsApp chat