Poetry: प्रेम प्रभात

प्रेम प्रभात

वियोग रात्रि की ठंड से ठिठुरे,
लालिमा की चादर ओढ़े,
धीरे-धीरे बढ़ते देखा था।

पहली बार प्रेम सूरज को,
गगन चढ़ते देखा था।

प्रभाकर ने पुष्कर पटल पर,
अदभुत चित्र उकेरा था।

मै स्तब्ध रहा निहारता,
सम्मुख सुन्दर सकल सजीव  सवेरा था

सौन्दर्य प्रभात का,
निर्मल विशुद्ध गंगाजल था।

मिलने को व्याकुल,
बढ़ रहा मेरी ओर हर पल था।

क्षणिक था किन्तु ,
अविश्वसनीय प्रसंग आया था।

प्रेम सने केसरी अंजलि में उसने,
समग्र संसार का सार समेट लाया था।

 

– डॉ. सुनील शर्मा , अमरावती – 9766938085

3 thoughts on “Poetry: प्रेम प्रभात

  • 24th October 2018 at 9:06 am
    Permalink

    बहुत आछा सुनील भाई । शब्दो के माध्यम से काफी आछा चित्रढ़ किया है आपने।

  • 24th October 2018 at 5:22 pm
    Permalink

    बहुत बहुत धन्यवाद मित्र।
    आप इसी तरह मेरी कविताएं पढ़ते रहिये,मै यूँ ही लिखता रहूँगा।

  • 25th October 2018 at 2:45 pm
    Permalink

    Thank you Ravi Bhai.

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