Poetry : “छठ महापर्व व्रत”

सूर्य की कठिन उपासना है, छठ व्रत!
यह साफ-सफाई निष्ठा- नियम
आस्था- विश्वास का महापर्व कहलाता है।
रोगमुक्त कर स्वस्थ शरीर
पूरे परिवार को असंख्य लाभ
प्रदान करनेवाले भगवान भास्कर का व्रत
प्रकृति की ही पूजा,है।
बहते हुए जल, तालाब नदी में,
सूर्य की अराधना करते हुए,
अर्ध दी जाती है ।
स्वच्छता इसमें कूट-कूट कर भरा
जो और भी महान उत्सव बनाता है।
समाजिक परिदृश्य में भी यह
सबको जोड़ जाता है ।
घर आँगन, बड़ा ही पावन।
साफ सफाई से झलकता है।
सजे हुए सारी नदी तालाब
भक्तो की भीड से चकाचौंघ है सारी घाट
घूप गूगूल से महकती हवा ,
आस्था का जनसैलाव
मानो अपनी बूराईयाँ मिटा रही हो
जीवन का संगीत,जैसे
परम्पराओं का मघुर संगीत गा रही हो।
क्या बच्चे क्या बूढे
मधुर लोक गीतों से
सबके दिलों में प्रीत बढा रही हो।
शुद्ध तन  निर्मल मन
भास्कर के विश्वास युक्त होकर
स्वच्छ वातावरण का
निर्माण कर रही है।
तीन दिन का यह व्रत
निराहार डूबते तथा उगते सूर्य को देते अर्घ
फल फूल ठेकुआ करते अर्पण
प्रकृति की प्रसाद युक्त पर्व
गूड केतारी गेहूँ से तैयार होता है
उर्जा का संचारक
शक्ति दायक
रोग निवारक
मनोकामना पूरक
सामाजिक समरसता से लबालब
छठ महापर्व कहलाता है।
     “आशुतोष”

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