Poetry : “सफर”

भूलता सफर हू मैं “जिन्दगी”
वक्त का मारा हुआ
दो कदम जीता हुआ
दो कदम हारा हुआ।

ऐसे तमाम रिश्तों का मारा हुआ
उदास लम्हों का सताया हुआ
जो मतलब के दो पहिये थे
अजीब दास्ता बन गयी अब तो
इसलिए ऐ “जिन्दगी”
दो कदम जीता हुआ
दो कदम हारा हुआ।

सूना था शोर बहुत है
तेरी गलियो मे “जिन्दगी”
पर देखे तूझे तो
महसूस किया
तू कितना खामोश है
गम का मारा  हुआ
तभी तो ऐ जिन्दगी
दो कदम जीता हुआ
दो कदम हारा हुआ।
“आशुतोष”

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