Poetry update: हर कदम पर खड़े…

हर कदम पर खड़े मिल ही जाएंगे ये
दूर कितने भी जाओ ..इन्हें छोड़ कर
आप अविनीत, बौद्धिक-स्वघोषित बनो
या चले जाओ जीवन से मुँह मोड़कर

धर्म धारण साधारण सी परिभाषा है
लोक – परलोक उत्तम की अभिलाषा है
है सदाचार सम न्याय प्रिय आचरण
जल्प फिरभी सदा रह गया प्यासा है
धर्म धीरज क्षमा आत्म सैयम ही है
कैसे नाता भला ..जाओगे तोड़ कर
हर कदम पर खड़े …

बौद्ध , हिन्दू या मुसलिम ईसाई नही
धर्म, मजहब की बढ़ती सी खाई नही
धूर्त, छलिया, जेहादी ना उन्माद है
है अनन्तों में अविरल , इकाई नही
धर्म पण्डा न मुल्ला ना पाखण्ड है
खण्डिनी गाड़ दे जो वो भुजदण्ड है
धर्म सांसों में शामिल अमिट छाप है
कैसे छिप जाओगे ओढ़नी ओढ़ कर
हर कदम पर खड़े …

ज्ञान, दर्शन, विचारण, मनन -आस्तिक
भोग, छल, धूर्तता से बना नास्तिक
विश्व – बंधुत्व पावन की कर कामना
प्रेम पथ पर बढ़ें सब को ही जोड़ कर
हर कदम पर खड़े …

 

– राजेश तिवारी, रीवा, म०प्र०

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