Poetry Update: कुरीतियाँ…..

 

कुरीतियाँ…..

योग मजहब मतों का न कुछ खास है
बस बुराई …..बुरे ही लोगों के पास है

उच्च शिक्षित भले लोग जितने मिले
पर दहेजों की इनको बड़ी प्यास है

अंधविश्वास, पाखंड से अब निकल
तू ही कर सकता है तुझसे ही आस है

आओ समरस करें जाति के द्वेष को
इस बुराई से जग प्राण बिन लाश है

भ्रूण कन्या का हत हो के नैतिक पतन
सब नियम अधिनियम का हुआ नाश है

लिंग – निष्पक्ष होकर बनाओ नियम
पक्ष – एकल से घर का हुआ ह्रास है

श्राद्ध, तर्पण, वो बुर्खा, बहुत बीवियां
सब के सब अवनति के ही ये ग्रास है

– Rajesh Tiwari, रीवा, म०प्र०

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