Poetry Update: Prem

प्रेम

प्रेम शब्द अनुठा है, अनुपम है,
भक्ति है; भाव है, भेद नही इसका।
ये न्यौछावर है, पूर्ण समपर्ण है,
ये योग है विच्छेद नही इसका।
जाति-धमण, राजा-रंक, सुंदर-कुरूप,
प्रेम परे इन भव बंधन से।
इसे भाए, मोहे,
प्रज्वलित हो लौ जो अंतर मन से।
प्रेम होता नही किसी की सीख से,
न ही कैलेंडर तारीख से।

जैसे खिलने पहले फूल पंचांग नहीं देखता

कली से मिलने से पहले भाँवरा मुहूर्त नहीं देखता
जैसे बदल अनायाश विचरता हे
वैसे ही प्रेम भी अनायाश उपजता है,
और जब उपजता है
तो हृदय में,
कटारी सी चलाता है,
किसी के रोके नहीं रुकता,
धीरे धीरे और भी हो हो जाता हे पुख्ता ।

सुनील शर्मा

WhatsApp chat