” कौन हो तुम ”

यह कौन
मुँह अँधेरे
लिखने लगता है
सुरमयी सुबह
यह कौन
सुनहरी शाम की गवाही में
स्याह उड़ेल देता है आकाश में
और अँधेरी रात लिखता है
कभी
बिखरा जाता है उजियारा
और चाँदनी रात की शीतलता लिखता है
उह कौन
पहाड़ों के खुरदुरे शरीर से
बहा लाता है निर्मल जलधारा
और नदी लिखता है
यह कौन
मीलों तक फैलाता है
वृक्षों की श्रृखंला
और जंगल बियाबान लिखता है
यह कौन
सिद्धहस्त घुड़सवार की तरह
चढ़ता है सूरज के घोड़े में
पलक झपकते क्षणों में अर्द्धवृत्त खींचता है
और इन्द्रधनुष लिखता है
यह कौन
बादलों का पंख बन जाता है
उड़ता/तैरता है
और गर्जना के साथ बारिश की बूंदे लिखता है
यह कौन
किसान के पसीने को
धरती के भीतर सोखता है
और बारिश में मिश्रण कर
लहलहाती फसल लिखता है
यह कौन
फूलों को रन-बिरंगे परिधान बाँटता है
और पलाश/गुलाब/मोंगरे की
महकती सुगंध लिखता है
यह कौन
बाँस के फूल से अनुबंध कर
कर्णप्रिय संगीत बिखेरता है
और बाँसुरी लिखता है
#सुधीर कुमार सोनी #

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