परिन्दे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है

दिल को छू लेने वाली कुछ पंक्तियां तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में, चिड़िया बना रही थी

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Poetry : विचलित मन – दम तोड रही मानवता

दम तोड़ रही मानवता समाज कितनी विचलित हो रही। सामाजिक कुप्रथाओं का चलन कितनी भयावह और विकृत हो रही। कहीं

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Poetry Update: बिन चैटिंग कैसे जिएं

जबसे बदला है तुमने रुख वाट्सएप्प, ट्ववटर और फेसबुक से। लगता नही कही मन मेरा, विरक्ति सी हो गई है

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